एलियंस के लिए भारत का कौन सा गाना भेजा गया, जो अंतरिक्ष में घूम रहा है? वाराणसी के वो कौन से साइंटिस्ट थे जिनके नाम पर प्लूटो का क्रेटर का नाम रखा गया है?

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साल 2003 में एक फिल्म आई जिसका नाम था, “कोई मिल गया”. रोशन खानदान का प्रोडक्ट. ये फिल्म ऋतिक रोशन के लिए मील का पत्थर तो साबित हुई ही. रिलीज के लगभग दो दशक बाद आज भी मीम संसार में लाइटहाउस बनकर खड़ी है. नये मीमागंतुकों को रास्ता दिखाती है.इस फिल्म में ही साइंटिस्ट संजय मेहरा एलियंस से संपर्क साधने की कोशिश करते हुए दिखाए गए. ||ॐ|| की अलग-अलग फ्रीक्वेंसी उन्होंने स्पेस में भेजीं. इस इंतज़ार में कि वहां से जवाब आएगा. ये बात और है कि जब असल में एलियंस आए तो पपराजी की तरह एक्ट करने के चक्कर में उन्होंने अपनी और अपने परिवार की लुटिया डुबो ली. बाद में उन्हीं का सिस्टम इस्तेमाल करके उनके बेटे रोहित ने स्पेस में उन्हीं आवाज़ों को दुबारा भेजा. और फ़टाफ़ट जवाब भी आ गया. जवाब के साथ एलियंस खुद पधार गए.

स्पेस और धरती छोड़ो, यहां घर पर लंच रखना हो और एक शहर के इंसानों को बुलाना चाहो तो पचहत्तर दिन बाद अपॉइंटमेंट मिलता है. उसका भी कुछ पक्का अता-पता नहीं. बैरहाल

जानने वाले तो ये भी कहते हैं कि ये फिल्म हॉलीवुड की ET फिल्म से प्रेरित थी. वैसे फिल्म में जितना आसान दिखाया गया, क्या स्पेस में संदेस भेजना उतना ही आसान है? दू, जो धूप खाता था लेकिन बाल सफ़ेद होने की चिंता उसे नहीं थी. क्योंकि उसे बाल था ही नहीं.

संदेसे जाते हैं

19वीं सदी में एक खगोलविद हुए थे. मूल रूप से ऑस्ट्रिया के. नाम था “जोसफ जोहन वॉन लिट्रो”. अंतरिक्ष पर इन्होंने ख़ूब पढ़ा-लिखा. पढ़ने को मिलता है कि इन्होंने तजवीज की थी कि सहारा रेगिस्तान में एक गोल नहर खोदी जाए. उसमें केरोसीन डालकर आग लगा दी जाए. कारण इसके पीछे ये कि इतने बड़े गोले में आग लगेगी, तो अंतरिक्ष से दिखेगी. दिखेगी तो अगर वहां कोई होगा तो उसे समझ आ जाएगा कि इस गोले पर कोई तो रहता है. खैर, ऐसा तो कभी हुआ नहीं. और ये बात भी पक्के तौर पर उन्होंने कही हो, इसका कोई ठोस सुबूत मिलता नहीं है. लेकिन चांद पर लिट्रो साहब के नाम के एक क्रेटर (गड्ढा) ज़रूर है. लब्बोलुआब ये कि उस समय अंतरिक्ष में मैसेज भेजने की बात वहीं धरी की धरी रह गई. चलिए थोड़ा आगे बढ़ते हैं.

साल 1962. महीना था नवंबर. भारत इस समय अपने पड़ोसी चीन के घात का शिकार हो रहा था. इस वक़्त दुनिया के किसी और देश में क्या चल रहा है, ये देख पाने का न तो समय था, न मौका. अक्टूबर के आखिरी हफ्ते से नवंबर के आखिरी हफ्ते तक चले इस युद्ध के बीच कुछ ऐसा हुआ, जो पहले कभी नहीं हुआ था. उस समय भारत के बेहद करीबी दोस्त रहे “सोवियत संघ” ने एक चिट्ठी भेजी थी. कहां? अंतरिक्ष में. इस उम्मीद के साथ कि कहीं कोई पढ़ने वाला हो तो पढ़ ले. फिर जवाब दे दे.

“मोर्स कोड” में लिखी गई ये पहली चिट्ठी थी जिसे स्पेस में भेजा गया. चिट्ठी तो क्या ही. रेडियो मैसेज था. जिसमें पहला शब्द भेजा गया था “मीर”. रशियन में इसका मतलब होता है विश्व/शांति. इसके बाद के मैसेज में USSR और लेनिन जैसे शब्द मोर्स कोड में भेजे गए. इसे वीनस ग्रह की तरफ निर्देशित करके भेजा गया था. इसी तरह के तकरीबन बारह इंटरस्टेलर रेडियो मैसेज अब तक अंतरिक्ष में भेजे जा चुके हैं. इनको शॉर्ट में “IRM” कहा जाता है.

साल 1974 में कुछ साइंटिस्ट्स ने “प्योर्तो रिको” की अरेसिबो ऑब्जर्वेटरी से एक रेडियो सन्देश भेजा. धरती से 25 हजार प्रकाश वर्ष की दूरी पर मौजूद सितारों के एक झुंड को. इसका नाम है ”मेसियर 13”. बाइनरी कोड में जो मैसेज भेजे गए, उनमें एक इंसानी शरीर की बेसिक ड्राइंग है (माने सीधे डंडे खींचकर बनाई गई सिर्फ रेखाओं वाली ड्राइंग जिसे स्टिक फिगर आर्ट भी कहते हैं), हमारे अपने DNA का स्ट्रक्चर है, टेलिस्कोप का एक रेखाचित्र है. इसे इस उम्मीद से भेजा गया था कि किसी को बीच में ये सन्देश मिले तो उसको डिकोड कर लें. पढ़ लें. समझ लें. हो सके तो जवाब वापस लिख दें. हालांकि साइंटिस्ट्स का मानना है कि जब तक ये सन्देश वहां तक पहुंचेगा, मेसियर 13, यानी वो सितारों का झुंड अपनी जगह से कहीं और चला गया होगा. एक मज़ेदार बात. इस मैसेज को भेजने वाले साइंटिस्ट्स की टीम में कार्ल सगन भी थे. जिनको पॉप कल्चर में भी काफी लोकप्रियता मिली हुई है। और साइंस से जुड़े नामों में उनका नाम काफी ज्यादा लोग जानते हैं.

इसी के तीन साल बाद 1977 में NASA ने स्पेस में अपना यान भेजा. “Voyager 1” के नाम से. इस यान में एक गोल्डन रिकॉर्ड है जिसकी तस्वीर आप नीचे देख सकते हैं. इस फोनोग्राफ रिकॉर्ड को चलाने के लिए मशीन भी साथ में दी गई. मशीन को कैसे चलाना है, इसकी जानकारी भी साथ में रखी गई. इसमें दुनिया की 55 भाषाओं में संदेश रिकॉर्ड किए गए. ये काम करने का जिम्मा NASA ने डॉक्टर “कार्ल सगन” को सौंपा. कहा, आप जैसे मैनेज कर सको, करो. फ्रीडम पूरी है. लेकिन टाइम थोड़ा कम है.

उस वक़्त डॉक्टर सगन कॉर्नेल यूनिवर्सिटी में पढ़ा रहे थे. तस्वीरों वगैरह के काम के लिए संयुक्त राष्ट्र की भी मदद ली गई. रिकॉर्डिंग में शामिल भाषाओं में से कुछ हैं अरबी, हिंदी, गुजराती, अंग्रेजी, बांग्ला, कन्नड़, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, मारवाड़ी, तेलुगु, उर्दू, तुर्की, सुमेरियन, स्पैनिश, सिंहली. भारतीय उपमहाद्वीप की भाषाओं को रिकॉर्ड कराने की ज़िम्मेदारी डॉक्टर बिशुन खरे ने उठाया था. ये लैब्रेटरी फॉर प्लेनेटरी स्टडीज में सीनियर फिजिसिस्ट थे. कॉर्नेल में जिन-जिन भारतीय लोगों को वो जानते थे, उन सबको कान्टैक्ट करके उन्होंने मैसेज रिकॉर्ड करवाने में सहायता ली.

डॉक्टर “बिशुन खरे” वाराणसी (काशी) में जन्मे थे. BHU से पढाई करके अमेरिका गए. वहां सिराक्यूज यूनिवर्सिटी में एडमिशन लिया. वहीं से फिजिक्स में डॉक्टरेट की उपाधि ली. 1960 से 1990 तक उन्होंने कॉर्नेल यूनिवर्सिटी में काम किया और डॉक्टर कार्ल सगन के असोसिएट भी रहे. कई पेपर भी पब्लिश हुए उनके. प्लूटो पर उन्होंने काफी रीसर्च की थी. डॉक्टर खरे के नाम पर प्लूटो के एक क्रेटर का नाम रखा गया है.

वॉइस मैसेज तुम्हें भेजा है ख़त में!

अंग्रेजी में जो संदेश ”Voyager 1″ के साथ भेजा गया फोनोग्राफ में, वो कहता है “Hello from the children of planet Earth”. हिंदी में संदेश है – धरती के वासियों की ओर से नमस्कार. मराठी संदेश कहता है – नमस्कार. ह्या पृथ्वीतील लोक तुम्हाला त्यांचे शुभविचार पाठवतात आणि त्यांची इच्छा आहे की तुम्ही ह्या जन्मी धन्य व्हा. पंजाबी का संदेश है, ਆਓ ਜੀ, ਜੀ ਆਇਆਂ ਨੂੰ (आओ जी, जी आया नूं).

ऐसे ही संदेशों के साथ उस रिकॉर्ड पर तस्वीरें हैं. कई आवाजें हैं प्रकृति और इंसानों की दुनिया की. चिड़ियों, जानवरों, बारिश, ट्रेन, घोड़े सबकी आवाज़. क़दमों की, हंसी की, हवा की, झींगुरों की आवाजें. दुनिया भर का संगीत. लोकसंगीत. क्लासिकल म्यूजिक. बाख़ और बीथोवन. भारत से संगीत गया राग भैरवी में ‘जात कहां हो’. गाने वाली थीं “सुरश्री केसरबाई केरकर”. साढ़े तीन मिनट का ये संगीत उस रिकॉर्ड पर मौजूद है. इस रिकॉर्ड की एक कॉपी “Voyager 2” पर भी है.

इतने सारे संदेशों के जाने के बाद, क्या कुछ वापस आने की उम्मीद है? संभावना है? लाइव साइंस को दिए एक इंटरव्यू में “शेरी वेल्स जेंसन” कहती हैं कि ऐसा होने के चांसेज शून्य हैं. वेल्स जेंसन भाषाविद हैं और एलियन इंटेलिजेंस में स्पेशलाइज करती हैं. उनका कहना है कि

“ये सन्देश भेजने का प्रयास एक कविता के जैसा सुंदर और बहादुर था, और ये हमारे सबसे बेस्ट रूप को रिप्रेजेंट करता है, भले ही असल संवाद करने के लिए ये एकदम ही पॉइंटलेस क्यों न हो. पर सब कुछ पॉइंटलेस हो, ऐसा भी नहीं है. हम उनकी खोज में हैं, वो क्यों न हमारी खोज में होंगे. हमने जो सबसे जरूरी बात कहनी थी वो कह दी है, कि हम एग्जिस्ट करते हैं.”

वो ज्ञानी बाबा कह गए हैं न, What you seek is seeking you. शायद लौटेगा कभी कोई संदेश. इस जन्म में न सही. शायद किसी और जन्म में. बस इसी इंतेज़ार में आज तक इतने संदेस भेजे जाते हैं कि कोई तो ऐसा दिन होगा जिस दिन वहां से वापस कोई संदेस आएगा

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