इन शहीदों को के शहादत को दिल से सलाम, जानिए क्यू मानते है शहीद दिवश

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आज का दिन हम शहीदों के सहादत को यद् करते है जिसे हम सहीद दिवश के रूप में मानते है , इस दिन भारत के कई वीर सपूत अपनी मातृभूमि के लिए अपने प्राण निछावर कर दिए थे बस भारत की आजादी के लिए आज हम जो भी कुछ है इन भारत माँ के वीर सपूतो के लिए जिन्होंने भारत के आजादी में अपने प्राण की आहुति दे दिए इन वीर क्रांतिकारियों की याद में हर साल 23 मार्च, को हम सब बलिदान दिवस या सर्वोदय दिवस के रूप में मनाते  है।

ये भारत माँ के लाला बस यही कहके दुनिया को अलविदा कहा की

“जब आँख खुले तो धरती हिन्दुस्तान की हो
जब आँख बंद हो तो यादेँ हिन्दुस्तान की हो
हम मर भी जाए तो कोई गम नही लेकिन
मरते वक्त मिट्टी हिन्दुस्तान की हो”

इस दिनों 23 मार्च को भगत सिंह तथा राजगुरु सुखदेव को फांसी दी गयी थी आइये जानते है कुछ इन शहीदों के बारे में ।

जो शहीद हुए है उनकी जरा यद् करो क़ुरबानी

भगत सिंह एअसे शख्स जो की फांसी के पूर्व मुस्कुराये थे और मुस्कुरा के मौत को गले लगाया था 27 सितंबर, 1907 को पंजाब के बंगा गांव में जारणवाला (अब पाकिस्तान में) में जन्मे भगत सिंह एक स्वतंत्रता सेनानी परिवार में पले-बढ़े थे। उनके चाचा सरदार अजीत सिंह और उनके पिता (किशन सिंह) महान स्वतंत्रता सेनानी थे।

इसी प्रकार  सुखदेव  का जन्म 1908 में पुणे जिले के खेड़ा गांव में हुआ था। 6 साल की उम्र में पिता की मृत्यु हो जाने के बाद बहुत छोटी उम्र में ही वाराणसी में अध्ययन और संस्कृत सीखने आए थे। अपने पिता के मृत्युका प्रतिशोध लिए जिन्होंने 19 दिसंबर 1928 को भगत सिंह के साथ मिलकर सांडर्स को गोली मारी थी।

वहीं 28 सितंबर 1929 को राजगुरु ने एक गवर्नर को भी मारने की कोशिश की थी, जिसके अगले दिन ही उन्हें पुणे से गिरफ्तार कर लिया गया था बाद में उन्हें 23 मार्च को फांसी पे लटका दिया गया आज भी शहीदों को स्मरण किया जाता है तो आंखे नम हो जाती है ।

 

 

 

 

 

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