कागज के बनाए फूलों की खड़ी कर दी कम्पनी, टर्नओवर पहुंचा 64 करोड़ के पार: एक आईडिया ने बदल दी ज़िन्दगी।

kagaj ke fool

हम सबने बचपन में बारिश के समय कागज की नाव बनाई है। और वो कागज़ की नाव पानी मे चलाई भी है, कागज के भिन्न-भिन्न प्रकार के रंग-बिरंगे खिलौने बनाना हम सबको खूब भाता है लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिन्होंने इसे करोड़ो के कारोबार में बदल दिया। इस कागज़ के फूलों की कंपनी से जलते हैं हज़ारों घर के चूल्हें हज़ारों महिलाओं के साथ चलती है ये कागज़ की कंपनी।

बेंगलुरु (Bengaluru) के 53 वर्षीय हरीश (Harish) और 52 वर्षीय रश्मि (Rashmi) ने बचपन की इस साधारण गतिविधि को 64 करोड़ रुपये के कारोबार में बदल दिया है। यह व्यपार सिर्फ उन्हें ही नहीं बल्कि लगभग 2,000 महिलाओं के जीवन में खुशबू फैला रही है। हरीश और रश्मि ने वर्ष 2004 में बेंगलुरु में पेपर फ्लावर बनाने की इकाई शुरू की, जो अब 64 करोड़ रुपये के कारोबार में बदल गई है।

वे अपनी कंपनी एईसी ऑफशोर प्राइवेट (ACE Offshore Private) के माध्यम से कला, शिल्प उत्पादों के निर्माण, बिक्री और निर्यात में सफलता हासिल कर रहे हैं। उन्होंने अपनी कम्पनी में कार्य के लिए महिलाओं के साथ ऐसे लोगों को रखा है, जो पांच प्रतिशत शारीरिक रूप से अक्षम है। उनकी कम्पनी में कागज के फूल, स्टिकर, कार्ड निर्माण एवं स्क्रैप बुकिंग का निर्माण होता है। वर्ष 2007 में उन्होंने बेंगलुरु में अपने पहले इट्टी बिट्सी (Itsy Bitsy) स्टोर के साथ खुदरा बाजार में प्रवेश किया, जिसकी अब देशभर के सात शहरों में 21 स्टोर है। जिनमें से 11 बेंगलुरु में हैं, बाकी चेन्नई, मुंबई, हैदराबाद और दिल्ली में हैं।

रश्मि मूल रूप से एक होम्योपैथी डॉक्टर हैं, जो इट्सी बिट्सी की सीईओ और एमडी भी हैं और वह खुदरा कारोबार को संभालती हैं। वहीं हरीश एक सिविल इंजीनियर हैं, और एईसी के सीईओ और एमडी भी हैं। वह विनिर्माण और निर्यात की देखभाल करते हैं। AEC और Itsy Bitsy अपने संयुक्त कारोबार में लगभग समान रूप से योगदान करते हैं।

रश्मि और हरीश प्री-यूनिवर्सिटी कोर्स के दिनों में एक-दूसरे को सहपाठियों के रूप में जानते थे। पीयूसी के बाद हरीश ने अपनी इंजीनियरिंग की और रश्मि ने गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज, बेंगलुरु में होम्योपैथी कोर्स में दाखिला लिया। हरीश ने यह जानकारी दिया कि “जब मैं सिंगापुर में काम कर रहा था, तब मेरी माँ ने मुझ पर शादी करने का दबाव डाला। मैंने उससे कहा था कि मैं किसी जाने-माने व्यक्ति से शादी करूंगा और उन्होंने रश्मि से शादी की।”

किया विदेश का सफर

अब वे दोनों सिंगापुर में वापस गए और हरीश के सुझाव के आधार पर एक कंपनी ने भारतीय हस्तशिल्प बेचने के लिए एक शोरूम स्थापित किया। रश्मि ने हरीश के साथ काम करना शुरू किया। साल 1994 में दोनों बेहतर अवसरों के लिए सिडनी, ऑस्ट्रेलिया चले गए। रश्मि ने वहां के एक नेचुरोपैथी कॉलेज में पढ़ाना शुरू किया। तुरंत नौकरी न मिलने पर हरीश ने दुर्घटना बीमा पॉलिसी शुरू किया।

अब हरीश को कन्फेक्शनरी डिवीजन और भारतीय मूल के उत्पादों के लिए विक्रेता के रूप में काम पर रखा गया था। उन्होंने बताया कि कन्फेक्शनरी लाइन में काम करना मेरे लिए बिल्कुल नया था। हालांकि मैंने अपने छह साल के कार्यकाल के दौरान पूरी दुनिया की यात्रा करने और उत्पादों की सोर्सिंग के बारे में बहुत कुछ सीखा था, जिससे यह थोड़ा सरल हुआ।

कोर्स काम आ गए

रश्मि को क्लिंट के होलसेल डिवीजन में नौकरी भी मिल गई। हरीश ने बताया कि उन्होंने दो साल में क्लिंट के कन्फेक्शनरी कारोबार को 300,000 अमेरिकी डॉलर से बढ़ाकर 5 मिलियन अमेरिकी डॉलर कर दिया। लेकिन जब उन्हें हेरिटेज चॉकलेट्स, मेलबर्न से आकर्षक ऑफर मिला, तो उन्होंने 18 महीने के अनुबंध पर हस्ताक्षर किए और कंपनी में शामिल हो गए। मेलबर्न में रश्मि ने प्लास्टिक होज़ बनाने वाली कंपनी में काम किया और ग्राफिक डिजाइनिंग का कोर्स भी किया।

जब हेरिटेज चॉकलेट्स का अनुबंध समाप्त हो गया, तो वे दंपति सिडनी वापस चले गए और अपनी खुद की कंपनी ऑस्ट्रेलियन एक्सपोर्ट कनेक्शन (AEC) की स्थापना की। AEC ने ऑस्ट्रेलिया में भारतीय उत्पादों का आयात किया। उन्होंने लगभग डेढ़ साल में कारोबार बंद कर दिया और साल 2004 में बेंगलुरू आ गए।

शुरू हुआ पहला कारखाना

दंपति ने कागज के फूल बनाने के लिए बन्नेरघट्टा रोड पर किराए पर एक छोटी सी फैक्ट्री ली। उन्होंने बताया कि “ऑस्ट्रेलिया में रहने के बाद, हम स्क्रैपबुकिंग उद्योग के संपर्क में आए, जिस कारण हमने थाईलैंड से कई तरह के कागज के फूल आते देखे थे। रश्मि ने बताया कि “हम अपने खुद के डिजाइन लेकर आए और ग्रामीण महिलाओं को हमारे लिए हस्तनिर्मित कागज के फूल बनाने के लिए प्रशिक्षित किया। उन्होंने 20 श्रमिकों के साथ बेंगलुरु में अपना पहला कारखाना स्थापित किया।

बंद होने वाली थी कम्पनी

उन्होंने व्यवसाय को बंद करने का लगभग फैसला कर लिया था लेकिन जब यूके के एक ग्राहक ने एक बड़ा ऑर्डर दिया और 100,000 अमेरिकी डॉलर का अग्रिम दिया, जिससे उन्हें वापस आने में मदद मिली। क्लिंट में सिडनी में हरीश के पूर्व बॉस ने भी जब हरीश ने मदद के लिए उनसे संपर्क किया तो उन्होंने 100,000 अमेरिकी डॉलर की मदद की।

लिटिल बर्डी नाम से ब्रांडिग

इट्सी बिट्सी के कागज़ के फूल और अन्य शिल्प आइटम लिटिल बर्डी ब्रांड नाम के तहत बेचे जाते हैं। वे अपने आउटलेट पर हस्तनिर्मित मोती भी बेचते हैं। महिलाएं मोतियों को खरीदती हैं, जो प्लास्टिक, कांच, टेराकोटा और चीनी मिट्टी के बने होते हैं और उन्हें अपने स्वयं के आभूषण बनाने के लिए एक साथ स्ट्रिंग करती हैं।

रोजगार मुहैया कराया

AEC और Itsy Bitsy लगभग 1,000 महिलाओं को प्रत्यक्ष रोजगार प्रदान कर रही हैं और अन्य 1,000 को अप्रत्यक्ष रोजगार प्रदान कर रही है। एईसी में हस्तनिर्मित फूल बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला कागज पुनर्नवीनीकरण टी-शर्ट के कचरे से बनाया जाता है। पुराने टी-शर्ट को खरीदने के बाद उनको मशीनों से सूत में तब्दीली किया जाता है और फिर इससे फूल बनाने में मदद मिलती है।

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