शुद्ध देसी घी को बनाने में मात्र 23 रुपये का खर्च….

चमड़ा सिटी के नाम से मशहूर कानपुर मैं जाजमऊ से गंगा जी के किनारे 12 किलोमीटर के दायरे में आप घूमने जाओ तो आपको नाक बंद करने पड़ेंगे क्योंकि यहां गंगा किनारे भठियां धधक रही होती हैं। इन भठियों में जानवरों को काटने के बाद निकली चर्बी को जलाया जाता है।

• इस चर्बी का उपयोग एनामेल पेंट जिसे हम अपने घर की दीवारों पर लगाते हैं, बनाया जाता है।

• फेविकोल जिसका हम प्रयोग हम सदियों से कागज चिपकाने, लकड़ियों को जोड़ने के लिए करते हैं, बनाया जाता है।

• इस चर्बी का सबसे महत्वपूर्ण प्रयोग शुद्ध देसी घी बनाने के लिए किया जाता है और यह देसी घी थोक मंडियों में 120 से 150 किलो तक भरपूर बिकता है।

आम बोलचाल में इसे पूजा वाला घी या भट्कल का घी भी कहते हैं।
इस घी का प्रयोग ज्यादातर भंडारे में किया जाता है। यह भी बिल्कुल ही शुद्ध देसी घी की तरह ही होता है जिसे आप पहचान नहीं सकते हैं।

औद्योगिक क्षेत्र में फैली वनस्पति घी बनाने वाली फैक्ट्रियां भी इस जहर को बहुताय में खरीदती हैं। गांव, देहात में लोग इसी वनस्पति घी से बने लड्डू विवाह शादियों में मजे से खाए जाते हैं, जो लोग जाने अनजाने खुद को शाकाहारी समझते हैं लेकिन जीवन भर मास के चर्बी से ही बने घी का उपयोग करते हैं।

देसी घी को बेचने वाली बड़ी कंपनियों भी इसे बेच कर मुनाफा कमाती हैं। इस घी का बहुत सारे लोग घर के पूजा पाठ में उपयोग करते है।

इस सच्चाई को जानने के बाद आप अपने आप को इस घी के उपयोग से कितना दूर रख पाते हैं, यह आपके ऊपर ही निर्भर करता है.

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