साल 2016 के वो तीस सेकेंड जिन्होंने IAS सुहास एलवाई को Tokyo2020 पैरालंपिक्स का सिल्वर जिता दिया

Tokyo 2020 Paralympics खेलने जा रहे IAS Suhas LY की जर्नी कमाल की रही है नोएडा बोले तो गौतमबुद्ध नगर के डीएम सुहास एलवाई ने टोक्यो पैरालंपिक्स में सिल्वर मेडल जीत लिया है. हालांकि फाइनल में उन्हें फ्रेंच शटलर से हार मिली थी. इस हार के बाद भी वह पैरालंपिक्स में सिल्वर जीतने वाले पहले भारतीय IAS बन गए.

मंगलवार 29 नवंबर, 2016. यूपी का जिला आजमगढ़. जब पूरा शहर जश्न की भरपूर तैयारी में था. लोग बेहद खुश थे. और आश्चर्य की बात ये थी कि इस खुशी में न तो गन्ना शामिल था और न ही धान. इन दोनो फसलों के लिए मशहूर आजमगढ़ की खुशी का कारण दूसरा सुदूर कर्नाटक में जन्मा एक 33 साल का युवा था. जो उस वक्त शहर का हाकिम होने के साथ नंबर एक का बैडमिंटन स्टार भी था. आपको बता दें कि शायर कैफी आज़मी का ये शहर इस रोज़ “सुहास लालिनकेरे यतिराज” यानी सुहास एलवाई के तराने गा रहा था.

चाइना में हुई एशियन बैडमिंटन चैंपियनशिप का गोल्ड जीतने के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मिलकर लौटे सुहास अपने स्वागत में पूरे शहर को उमड़ा देखकर आश्चर्यचकित हो रह गए. लेकिन ये आश्चर्य आने वाले दिनों में उनके लिए बेहद नॉर्मल होने वाला था. उन्होंने राह ही ऐसी चुन ली थी. और उसी चुनी राह पर चलते-चलते अब सुहास पैरालंपिक्स तक पहुंच गए हैं.

कौन हैं सुहास?
सुहास हमेशा से बैडमिंटन नहीं खेलना चाहते थे. और ना ही उनकी टू डू लिस्ट में IAS बनना था. 2 जुलाई 1983 को कर्नाटक के शहर हसन में पैदा हुए सुहास बचपन से ही एक पैर से विकलांग हैं. सुहास का दाहिना पैर पूरी तरह फिट नहीं है. और जैसा कि रवायत है, और जैसा कि हम सब जानते हैं कि किसी की कमियां दूसरों से बर्दाश्त नहीं होती और उन कमियों के मज़ाक बनाने लगते हैं ऐसा ही सुहास के साथ भी हुआ था.

लेकिन सुहास के सिविल इंजिनियर पिता ऐसे हालातों में अपने बेटे के साथ चट्टान की तरह डट कर खड़े रहे. उनकी अलग-अलग जगहों पर होती पोस्टिंग और समाज के ताने कभी भी सुहास के भविष्य पर कभी आंच नहीं आने दी. पिता और परिवार के साथ शहर दर शहर बदलते हुए सुहास ने अपनी पढ़ाई पूरी की. गांव के स्कूल से शुरू हुई सुहास की पढ़ाई खत्म हुई सुरतकल शहर में. सुहास ने यहीं के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से कम्प्यूटर साइंस में डिस्टिंक्शन के साथ अपनी इंजिनियरिंग पूरी की.

हालांकि सुहास के इंजिनियर बनने के पीछे भी मजेदार क़िस्सा है. बारहवीं के बाद उन्होंने मेडिकल और इंजिनियरिंग, दोनों की परीक्षा दी. और मज़े की बात तो ये है कि सुहास दोनों में पास भी हो गए. पहले ही राउंड की काउंसिलिंग के बाद उन्हें बैंगलोर मेडिकल कॉलेज में सीट भी मिल गई. लेकिन उनका मन अभी भी इंजिनियरिंग की ओर ही था. पूरा परिवार चाहता था कि सुहास डॉक्टर बनें हालांकि सुहास उनकी इच्छा के आगे सरेंडर भी कर चुके थे. लेकिन तभी एक दिन उन्हें मुंह लटकाए बैठा देख सुहास के पिता ने कहा,

‘जा बेटे, जी ले अपनी जिंदगी’

और आप तो जानते हैं की एक पिता के मुह से जब ये निकल जाए तब एक ज़िम्मेदार बेटा क्या नहीं कर सकता. बस, यहीं से तय हुआ कि सुहास अब इंजिनियर ही बनेंगे. पढ़ाई में बेहद तेज सुहास खेलकूद में भी आगे रहते थे. और बाकी भारतीय बच्चों/युवाओं की तरह उनका भी मन क्रिकेट समेत अन्य कई खेलों में लगता था. हालांकि क्रिकेट के अच्छे खिलाड़ी रहे सुहास ने कभी प्रोफेशनल एथलीट बनने के बारे में नहीं सोचा था. इंजिनियरिंग के बाद उन्होंने लगभग हर भारतीय इंजिनियर के ड्रीमप्लेस बेंगलुरु में ही एक आईटी फर्म को जॉइन कर ली. अब 2005 आते आते उ का मन सिविल सर्विस की ओर जान एक था उसी बीच उनके पिता की मृत्यु हो गयी

सबको हैरान करते हुए सुहास ने जमी जमाई नौकरी छोड़ दी और बताया कि उन्होंने प्री और मेंस की परीक्षा निकाल ली है अब 2007 में यूपीएससी निकाल लिया है अब उन्होंने सिविल सर्विस के लिए कमर कस लिया और यूपी के आज़मगढ़ में पोस्टेड भी हो गए डीएम की पोस्ट पर हालांकि जैसा हम पहले ही बता चुके हैं कि उन्हें खेलने का बहुत शौक था तो अब वो बैडमिंटन पर आना फोकस ज़्यादा करते थे

बैडमिंटन चैंपियन सुहास..
शौकिया बैडमिंटन खेलने वाले सुहास ने अब साल 2016 की पैरा एशियन चैंपियनशिप में भाग लेने का फैसला कर लिया. बिना किसी को बताये वो चाइना निकल गए और पहला सेट वो हार गए. और दूसरा सेट भी 12-9 से विपक्षी प्लेयर की ओर जा रहा था. तभी इसी स्कोर पर मिले ड्रिंक्स ब्रेक ने सब कुछ बदल दिया.

सुहास कहते हैं
‘इस ड्रिंक्स ब्रेक के दौरान मेरे एक दोस्त ने मुझे टोका. उसने कहा- डरकर क्यों खेल रहे हो भाई? और उसके टोकने के बाद मैंने भी सोचा कि एक हार से क्या ही होगा? और अगर हारना ही है तो अपना नेचुरल गेम खेलकर हारेंगे.’

इतना ही सोचना था कि पूरा गेम पलट कर रख दिया सुहास ने न सिर्फ गेम बल्कि टूर्नामेंट में गोल्ड जीतकर वापस लौट अब जिस बीवी को उनके बैडमिंटन से दिकत होती थी वो खुश थी. एलवाई सुहास और ऋतु सुहास अभी दो बच्चों के माता-पिता हैं. मौजूदा वक्त में नोएडा के डीएम की पोस्ट पर तैनात सुहास ने साल 2018 में जकार्ता में हुए एशियन पैरा गेम्स में ब्रॉन्ज़ मेडल भी जीता था.

सुहास बताते हैं
इसी दौरान आई दिवाली. घर वालों का प्लान था कि पूरे दिन घर में रहेंगे, शाम की तैयारी करेंगे. लेकिन मेरे दिमाग में तो एशियन पैरा गेम्स थे. बस मैं सुबह उठा, नाश्ता किया और अपनी बैडमिंटन किट उठाकर निकल गया प्रैक्टिस करने. मैंने इस छुट्टी का पूरा फायदा उठाया और शाम को बेहद खुश होकर घर लौटा. लेकिन मुझे ये बात कहाँ पता थी कि घर पर तूफान मेरा इंतजार कर रहा है. दिवाली के पूरे दिन मेरे गायब रहने से ऋतु बहुत गुस्सा हुई और फिर उसने मुझे जकार्ता गेम्स का ब्रॉन्ज़ मेडल जीतने के बाद ही माफ़ किया.

एशियन चैंपियनशिप और एशियन पैरा गेम्स में मेडल जीतने के बाद सुहास ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. अपने छोटे से करियर में वह कई इंटरनेशनल और नेशनल गोल्ड मेडल्स जीत चुके हैं. पांच साल में लगभग दो दर्जन मेडल्स अपने नाम करने वाले सुहास अब Tokyo2020 Paralympics के लिए भी पूरी तरह से तैयार हैं.

 

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